Monday, 16 October 2017

साईकिल का सम्मान

साईकिल का सम्मान :
(Holland in world & Manipur in India)


Viral picture: Netherlands or Holland prime minister rides bicycle to meet the King

Image result for Netherlands prime minister rides bicycle

Mark Rutte, who has led Netherlands since 2010, rode on his bicycle to the palace of the King of Netherlands for a meeting on Saturday.
A photo showed him locking his bicycle upon arrival at the palace with palace guards manning the entrance already adorned with red carpet.


साइकिल से नामांकन भरने पहुंचीं 'आयरन लेडी' ईरोम शर्मिला


16 साल तक भूख हड़ताल पर रहने वाली आयरन लेडी के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला ने मणिपुर विधानसभा चुनावों के लिए अपना पर्चा दाखिल किया। आयरन लेडी साइकिल से 20 किलोमीटर का सफर तय कर अपना नामांकन दाखिल करने पहुंची। इरोम शर्मिला थाउबल से सूबे के सीएम ओमकार आइबोबी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं।

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संघीय चरित्र को नष्ट करने का प्रस्ताव

Date:15-10-17

संघीय चरित्र को नष्ट करने का प्रस्ताव

राजकिशोर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि देश भर में लोक सभा और सभी राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। चुनाव आयोग ने भी घोषणा कर दी है कि वह अगले साल ऐसा कराने में सक्षम है। चुनाव आयोग ने अपनी ओर से यह घोषणा क्यों की, यह पता नहीं है। निश्चय ही सरकार की ओर से उसे यह पता लगाने के लिए नहीं कहा गया होगा। सरकार ने ऐसा कहा है, तो यह एक बेकार की कवायद है क्योंकि लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराया जाना सिर्फ सरकार और आयोग के बीच का मामला नहीं है। स्वयं चुनाव आयोग ने ही स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सभी राजनैतिक दल इसके लिए सहमत नहीं हो जाते, ऐसा नहीं किया जा सकता। जहां तक विभिन्न राजनैतिक दलों के सहमत हो जाने का प्रश्न है, यह संभव दिखाई नहीं देता। केंद्र के साथ-साथ सभी राज्यों में भाजपा की सरकार होती तो शायद इसे संभव किया जा सकता था, हालांकि तब भी गंभीर संवैधानिक बाधाएं रहतीं।
इस समय भाजपा बढ़त पर है। यह कब तक टिकेगी, पता नहीं। लेकिन यह मान पाना कठिन है कि कभी वह समय आएगा जबकि देश भर में भाजपा की ही सरकारें हैं। 2019 के लोक सभा चुनाव में मोदी की जीत सौ प्रतिशत पक्की है, यह दावा भी अब कोई नहीं करता। भाजपा के भीतर भी संदेह पैदा होने लगा है, क्योंकि मोदी से जनता का मोहभंग शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में लगता है कि मोदी का समानांतर चुनाव का सपना सपना ही बना रहेगा। समानांतर चुनाव के पीछे एक ही तर्क हो सकता है कि इससे चुनाव पर होने वाला भारी-भरकम चुनाव खर्च बहुत कम हो जाएगा। लेकिन मैं नहीं समझता कि सिर्फ चुनाव खर्च में बचत करने के लिए समानांतर चुनाव का विचार देश के सामने पेश किया गया है। इरादा यह होता तो चुनाव खर्च में कमी लाने के और उपाय भी हैं, जिन्हें आजमाया जा सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा सिर्फ उम्मीदवारों के लिए है, राजनैतिक दलों के लिए नहीं। दल चाहे जितना पैसा चुनाव में झोंक सकते हैं। निश्चय ही यह लोकतंत्र विरोधी स्वतंत्रता है। राजनैतिक दलों पर भी अंकुश लगाया जा सकता है कि वे लोक सभा और विधान सभा की एक-एक सीट के लिए चुनाव प्रचार में एक सीमा से अधिक खर्च नहीं कर सकते। उनके खातों की ऑडिटिंग अनिवार्य कर देने से भी उनके अनाप-शनाप खर्च पर कुछ अंकुश लग सकता है। अभी स्थिति यह है कि जिस दल के पास जितना ज्यादा पैसा है, वह चुनाव प्रचार में उतना ही ज्यादा खर्च कर सकता है। यह पूंजीवाद की चुनाव पण्राली है, जिसमें बड़ी मछली छोटी मछली का फर्क बराबर बना रहता है। इससे विभिन्न राजनैतिक दल वैध या अवैध तरीकों से ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं, जिससे राजनीति निश्चित रूप से दूषित होती है। लेकिन लोकतंत्र का उद्देश्य इस विषमता को पाटना है, न कि और चौड़ा करना। इसका सब से अच्छा तरीका यही है कि चुनाव का सारा खर्च सरकार उठाए। फायदा यह होगा कि जो मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जितना ज्यादा पैसा खर्च कर सकता है, उसके जीतने की संभावना उतनी ज्यादा होगी, यह विसंगति तो मिट ही जाएगी।
जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तब इसकी हलकी-फुलकी र्चचा शुरू भी हुई थी। लेकिन पता नहीं क्यों इस महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव को स्थगित कर दिया गया। इसलिए समानांतर चुनाव की कामना के पीछे कुछ और योजना होनी चाहिए। इस मामले में दो संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। एक यह कि सरकार भारत की संघीय पण्राली को कमजोर कर देश का ढांचा एकात्मक शासन वाली बनाना चाहती है। लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव अलग-अलग होते हैं, इसलिए भारत का संघात्मक ढांचा अपने आप स्पष्ट हो जाता है। वस्तुत: भाजपाई दिमाग संघवाद-विकेंद्रीकरण में विास नहीं करता। भारत को राज्यों का संघ (यूनियन ऑफ स्टेट्स, जैसा कि भारत के संविधान में बताया गया है) नहीं मानता। इसे सिर्फ एक इकाई के रूप में देखता है, जिसमें केंद्र का राज्य देश भर में चले। दूसरी संभावना राष्ट्रीय नायक की कल्पना से जुड़ी हुई है। वैसे तो कैबिनेट पण्राली अब कहीं रही नहीं, जिसमें मंत्रालय स्वायत्त होते हैं, जहां-जहां भी संसदीय जनतंत्र है, प्रधानमंत्री एक तरह से राष्ट्रपति की तरह काम करता है। सब से ज्यादा शक्तिशाली होता है, और मंत्रिमंडल तथा पूरी सरकार उसके इशारों पर नाचते हैं। लेकिन देश भर में चुनाव एक साथ होंगे, तब प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अगर बहुत मजबूत हुआ, तो वह सभी चुनावों को एक साथ प्रभावित कर सकता है। इसका नतीजा निकलेगा कि केंद्र में जिसकी सरकार बनेगी, अधिकांश राज्यों में भी उसी की सरकार बनेगी। कहने की जरूरत नहीं कि यह एकछत्र शासन को अप्रत्यक्ष निमंतण्रहै। इससे नायक पूजा की संस्कृति और मजबूत होगी, जो हमारे यहां पहले से ही कम नहीं है। सो, समानांतर चुनाव का विरोध लोकतांत्रिक राजनीति के हक में है। शुक्र है कि फिलहाल तो यह खामखयाली ही है। पर यह बुरा समय है। आज की कौन-सी खामखयाली कल यथार्थ होने के लिए व्याकुल होने लगे, कौन कह सकता है!

अमीरों पर टैक्स कम करने से दुनियाभर में फैलेगी अव्यवस्था


Date:16-10-17


अमीरों पर टैक्स कम करने से दुनियाभर में फैलेगी अव्यवस्था

एना स्वान्सन और जिम टेन्कर्सले 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का मुख्यालय वाशिंगटन में है और अगले कुछ ही दिन में उसकी बैठक होने वाली है। इस बैठक के पहले आईएमएफ ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि अमीरों पर कम टैक्स लगाने का प्रस्ताव न रखा जाए। अगर ऐसा हुआ तो दुनियाभर में अव्यवस्था फैलेगी और उस स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाएगा।आईएमएफ की चेतावनी खासतौर पर विकसित देशों को लेकर थी, जिसमें अमेरिका प्रमुख रूप से शामिल है। अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन और रिपब्लिकन सांसद ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं, जिसमें अमीरों से कम टैक्स लेने के प्रावधान शामिल हैं। जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे आय की असमानता दूर करने में दिक्कतें आएंगी, जो इन दिनों कई देशों में समस्या के तौर पर उभर रही है।अमेरिका में रिपब्लिकन सांसदों के प्रस्ताव के अनुसार निम्न से मध्यम आय वालों के लिए टैक्स की दरें समान होंगी, जबकि अधिक आय अर्जित करने वालों को निम्त दरों पर टैक्स चुकाना होगा। इसका मतलब जो गरीब और गरीब होता जाएगा और अमीर संपत्ति बनाते जाएगा। आईएमएफ ने कहा कि यह परेशानी बढ़ाने वाली प्रवृत्ति साबित होगी और इससे अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में असमानता को बढ़ावा मिलेगा।आईएमएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारों को दुनिया की बेहतर होती आर्थिक स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। घाटा कम करने के उपाय करने के उपाय के साथ-साथ टैक्स प्रणाली की खामियां दूर करने के कदम उठाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त सरकारों को चाहिए कि वे शिक्षा एवं गरीबों के स्वास्थ्य पर ज्यादा राशि खर्च करें। सरकारें मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुश्किलें टाल सकती हैं।


आईएमएफ की रिपोर्ट में कई देशों की आर्थिक नीतियों का उल्लेख है। उसमें बताया गया है कि कैसे सरकारों ने योजनाओं के भी हिस्से कर दिए हैं। उसमें अमीर वर्ग को गरीब से ज्यादा फायदा मिलता है, जिससे असमानता बढ़ती है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि असमानता कुछ मायनों में अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद भी होती है। उससे लोगों को प्रयास करने एवं कुछ नया करने का प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन इसमें किसी भी देश की ग्रोथ प्रभावित नहीं होनी चाहिए। हालांकि, शोध बताते हैं कि कई देशों में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। वास्तविकता यह है कि असमानता के कारण ग्रोथ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। उदाहरण के तौर पर जो लोग समृद्ध परिवारों से नहीं थे, वे अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं दे पाए।पिछले तीन दशकों में अमेरिका, चीन और भारत जैसे देशों को ही देखें, वहां अमीर वर्ग की आय तो रॉकेट की गति से बढ़ी, लेकिन निम्न एवं मध्यम वर्ग की स्थिति नहीं सुधरी। इस कारण असमानता भी तेजी से बढ़ी। कुछ विशेषज्ञ इसमें टेक्नोलॉजी को दोष देते हैं, कि रोबोट कम प्रतिभाशाली लोगों के जॉब छीन रहे हैं। ऐसा नहीं है। वैश्वीकरण के इस दौर में कंपनियां कम लागत वाले श्रम की ओर जा रही हैं। श्रम संगठनों की घटती संख्या या उनकी निष्क्रियता के चलते भी कर्मचारी अपनी बात नहीं रख पाते हैं।

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