Monday, 16 October 2017

साईकिल का सम्मान

साईकिल का सम्मान :
(Holland in world & Manipur in India)


Viral picture: Netherlands or Holland prime minister rides bicycle to meet the King

Image result for Netherlands prime minister rides bicycle

Mark Rutte, who has led Netherlands since 2010, rode on his bicycle to the palace of the King of Netherlands for a meeting on Saturday.
A photo showed him locking his bicycle upon arrival at the palace with palace guards manning the entrance already adorned with red carpet.


साइकिल से नामांकन भरने पहुंचीं 'आयरन लेडी' ईरोम शर्मिला


16 साल तक भूख हड़ताल पर रहने वाली आयरन लेडी के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला ने मणिपुर विधानसभा चुनावों के लिए अपना पर्चा दाखिल किया। आयरन लेडी साइकिल से 20 किलोमीटर का सफर तय कर अपना नामांकन दाखिल करने पहुंची। इरोम शर्मिला थाउबल से सूबे के सीएम ओमकार आइबोबी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं।

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संघीय चरित्र को नष्ट करने का प्रस्ताव

Date:15-10-17

संघीय चरित्र को नष्ट करने का प्रस्ताव

राजकिशोर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि देश भर में लोक सभा और सभी राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। चुनाव आयोग ने भी घोषणा कर दी है कि वह अगले साल ऐसा कराने में सक्षम है। चुनाव आयोग ने अपनी ओर से यह घोषणा क्यों की, यह पता नहीं है। निश्चय ही सरकार की ओर से उसे यह पता लगाने के लिए नहीं कहा गया होगा। सरकार ने ऐसा कहा है, तो यह एक बेकार की कवायद है क्योंकि लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराया जाना सिर्फ सरकार और आयोग के बीच का मामला नहीं है। स्वयं चुनाव आयोग ने ही स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सभी राजनैतिक दल इसके लिए सहमत नहीं हो जाते, ऐसा नहीं किया जा सकता। जहां तक विभिन्न राजनैतिक दलों के सहमत हो जाने का प्रश्न है, यह संभव दिखाई नहीं देता। केंद्र के साथ-साथ सभी राज्यों में भाजपा की सरकार होती तो शायद इसे संभव किया जा सकता था, हालांकि तब भी गंभीर संवैधानिक बाधाएं रहतीं।
इस समय भाजपा बढ़त पर है। यह कब तक टिकेगी, पता नहीं। लेकिन यह मान पाना कठिन है कि कभी वह समय आएगा जबकि देश भर में भाजपा की ही सरकारें हैं। 2019 के लोक सभा चुनाव में मोदी की जीत सौ प्रतिशत पक्की है, यह दावा भी अब कोई नहीं करता। भाजपा के भीतर भी संदेह पैदा होने लगा है, क्योंकि मोदी से जनता का मोहभंग शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में लगता है कि मोदी का समानांतर चुनाव का सपना सपना ही बना रहेगा। समानांतर चुनाव के पीछे एक ही तर्क हो सकता है कि इससे चुनाव पर होने वाला भारी-भरकम चुनाव खर्च बहुत कम हो जाएगा। लेकिन मैं नहीं समझता कि सिर्फ चुनाव खर्च में बचत करने के लिए समानांतर चुनाव का विचार देश के सामने पेश किया गया है। इरादा यह होता तो चुनाव खर्च में कमी लाने के और उपाय भी हैं, जिन्हें आजमाया जा सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा सिर्फ उम्मीदवारों के लिए है, राजनैतिक दलों के लिए नहीं। दल चाहे जितना पैसा चुनाव में झोंक सकते हैं। निश्चय ही यह लोकतंत्र विरोधी स्वतंत्रता है। राजनैतिक दलों पर भी अंकुश लगाया जा सकता है कि वे लोक सभा और विधान सभा की एक-एक सीट के लिए चुनाव प्रचार में एक सीमा से अधिक खर्च नहीं कर सकते। उनके खातों की ऑडिटिंग अनिवार्य कर देने से भी उनके अनाप-शनाप खर्च पर कुछ अंकुश लग सकता है। अभी स्थिति यह है कि जिस दल के पास जितना ज्यादा पैसा है, वह चुनाव प्रचार में उतना ही ज्यादा खर्च कर सकता है। यह पूंजीवाद की चुनाव पण्राली है, जिसमें बड़ी मछली छोटी मछली का फर्क बराबर बना रहता है। इससे विभिन्न राजनैतिक दल वैध या अवैध तरीकों से ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं, जिससे राजनीति निश्चित रूप से दूषित होती है। लेकिन लोकतंत्र का उद्देश्य इस विषमता को पाटना है, न कि और चौड़ा करना। इसका सब से अच्छा तरीका यही है कि चुनाव का सारा खर्च सरकार उठाए। फायदा यह होगा कि जो मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जितना ज्यादा पैसा खर्च कर सकता है, उसके जीतने की संभावना उतनी ज्यादा होगी, यह विसंगति तो मिट ही जाएगी।
जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तब इसकी हलकी-फुलकी र्चचा शुरू भी हुई थी। लेकिन पता नहीं क्यों इस महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव को स्थगित कर दिया गया। इसलिए समानांतर चुनाव की कामना के पीछे कुछ और योजना होनी चाहिए। इस मामले में दो संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। एक यह कि सरकार भारत की संघीय पण्राली को कमजोर कर देश का ढांचा एकात्मक शासन वाली बनाना चाहती है। लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव अलग-अलग होते हैं, इसलिए भारत का संघात्मक ढांचा अपने आप स्पष्ट हो जाता है। वस्तुत: भाजपाई दिमाग संघवाद-विकेंद्रीकरण में विास नहीं करता। भारत को राज्यों का संघ (यूनियन ऑफ स्टेट्स, जैसा कि भारत के संविधान में बताया गया है) नहीं मानता। इसे सिर्फ एक इकाई के रूप में देखता है, जिसमें केंद्र का राज्य देश भर में चले। दूसरी संभावना राष्ट्रीय नायक की कल्पना से जुड़ी हुई है। वैसे तो कैबिनेट पण्राली अब कहीं रही नहीं, जिसमें मंत्रालय स्वायत्त होते हैं, जहां-जहां भी संसदीय जनतंत्र है, प्रधानमंत्री एक तरह से राष्ट्रपति की तरह काम करता है। सब से ज्यादा शक्तिशाली होता है, और मंत्रिमंडल तथा पूरी सरकार उसके इशारों पर नाचते हैं। लेकिन देश भर में चुनाव एक साथ होंगे, तब प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अगर बहुत मजबूत हुआ, तो वह सभी चुनावों को एक साथ प्रभावित कर सकता है। इसका नतीजा निकलेगा कि केंद्र में जिसकी सरकार बनेगी, अधिकांश राज्यों में भी उसी की सरकार बनेगी। कहने की जरूरत नहीं कि यह एकछत्र शासन को अप्रत्यक्ष निमंतण्रहै। इससे नायक पूजा की संस्कृति और मजबूत होगी, जो हमारे यहां पहले से ही कम नहीं है। सो, समानांतर चुनाव का विरोध लोकतांत्रिक राजनीति के हक में है। शुक्र है कि फिलहाल तो यह खामखयाली ही है। पर यह बुरा समय है। आज की कौन-सी खामखयाली कल यथार्थ होने के लिए व्याकुल होने लगे, कौन कह सकता है!

अमीरों पर टैक्स कम करने से दुनियाभर में फैलेगी अव्यवस्था


Date:16-10-17


अमीरों पर टैक्स कम करने से दुनियाभर में फैलेगी अव्यवस्था

एना स्वान्सन और जिम टेन्कर्सले 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का मुख्यालय वाशिंगटन में है और अगले कुछ ही दिन में उसकी बैठक होने वाली है। इस बैठक के पहले आईएमएफ ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि अमीरों पर कम टैक्स लगाने का प्रस्ताव न रखा जाए। अगर ऐसा हुआ तो दुनियाभर में अव्यवस्था फैलेगी और उस स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाएगा।आईएमएफ की चेतावनी खासतौर पर विकसित देशों को लेकर थी, जिसमें अमेरिका प्रमुख रूप से शामिल है। अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन और रिपब्लिकन सांसद ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं, जिसमें अमीरों से कम टैक्स लेने के प्रावधान शामिल हैं। जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे आय की असमानता दूर करने में दिक्कतें आएंगी, जो इन दिनों कई देशों में समस्या के तौर पर उभर रही है।अमेरिका में रिपब्लिकन सांसदों के प्रस्ताव के अनुसार निम्न से मध्यम आय वालों के लिए टैक्स की दरें समान होंगी, जबकि अधिक आय अर्जित करने वालों को निम्त दरों पर टैक्स चुकाना होगा। इसका मतलब जो गरीब और गरीब होता जाएगा और अमीर संपत्ति बनाते जाएगा। आईएमएफ ने कहा कि यह परेशानी बढ़ाने वाली प्रवृत्ति साबित होगी और इससे अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में असमानता को बढ़ावा मिलेगा।आईएमएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारों को दुनिया की बेहतर होती आर्थिक स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। घाटा कम करने के उपाय करने के उपाय के साथ-साथ टैक्स प्रणाली की खामियां दूर करने के कदम उठाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त सरकारों को चाहिए कि वे शिक्षा एवं गरीबों के स्वास्थ्य पर ज्यादा राशि खर्च करें। सरकारें मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुश्किलें टाल सकती हैं।


आईएमएफ की रिपोर्ट में कई देशों की आर्थिक नीतियों का उल्लेख है। उसमें बताया गया है कि कैसे सरकारों ने योजनाओं के भी हिस्से कर दिए हैं। उसमें अमीर वर्ग को गरीब से ज्यादा फायदा मिलता है, जिससे असमानता बढ़ती है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि असमानता कुछ मायनों में अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद भी होती है। उससे लोगों को प्रयास करने एवं कुछ नया करने का प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन इसमें किसी भी देश की ग्रोथ प्रभावित नहीं होनी चाहिए। हालांकि, शोध बताते हैं कि कई देशों में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। वास्तविकता यह है कि असमानता के कारण ग्रोथ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। उदाहरण के तौर पर जो लोग समृद्ध परिवारों से नहीं थे, वे अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं दे पाए।पिछले तीन दशकों में अमेरिका, चीन और भारत जैसे देशों को ही देखें, वहां अमीर वर्ग की आय तो रॉकेट की गति से बढ़ी, लेकिन निम्न एवं मध्यम वर्ग की स्थिति नहीं सुधरी। इस कारण असमानता भी तेजी से बढ़ी। कुछ विशेषज्ञ इसमें टेक्नोलॉजी को दोष देते हैं, कि रोबोट कम प्रतिभाशाली लोगों के जॉब छीन रहे हैं। ऐसा नहीं है। वैश्वीकरण के इस दौर में कंपनियां कम लागत वाले श्रम की ओर जा रही हैं। श्रम संगठनों की घटती संख्या या उनकी निष्क्रियता के चलते भी कर्मचारी अपनी बात नहीं रख पाते हैं।

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Sunday, 15 October 2017

Slow poison: 80% of New Delhi’s tap water has plastic toxins

Slow poison: 80% of New Delhi’s tap water has plastic toxins

NEW DELHI: More than 80% of New Delhi's tap water is contaminated by plastic microfibres, new research has shown. This is the third highest contamination rate in the world after the US (New York and Washington DC) and Beirut, Lebanon. These findings are part of a study conducted after testing 150 samples of tap water collected by news website Orb Media from five continents.

Though many in Delhi's well-off circles do not use tap water for drinking, large swathes of the capital's population have no access to safe drinking water.

Research found the US had the highest contamination at 94%. Plastic fibres were found in samples taken from various sites, including the Congress buildings and Trump Tower in New York. Beirut was marginally behind at 93% followed by India at 82%. European nations, including UK, Germany and France, had the lowest contamination rate of 72%.

These microscopic fragments enter the water system in several ways, from synthetic fibre clothing, tyre dust and microbeads. Most of these are believed to originate from clothes, upholstery and carpets. Washing machines and dryers add to the problem. According to a Guardian report, a UK study found that each cycle of a washing machine could release more than 700,000 microscopic plastic particles.

Scientists suspect plastic can leach toxins once inside the human body. Sherri Ann Mason, an expert on plastic pollution at the State University of New York in Freedonia, who supervised Orb's study, said: ``We have enough data from looking at wildlife and the impact that it's having on wildlife to be concerned. If it's impacting them, then how do we think it's not going to somehow impact us?"

Commenting on the extent of pollution, Mason told TOI that the findings had surprised her. "Study after study has indicated the contamination of every compartment of our environment. As plastic is so prominent in the world's water in general, I suppose I shouldn't have been surprised to find it in our drinking or tap water, but I thought with our filtration methods the particles would be removed." 

About 300 million tons of plastic is produced annually in the world. While scientists have focused their attention on oceans and rivers, studying plastic pollution's impact on marine life, seabirds and the human food chain, the effect of microplastic's presence in the human body has still not been researched enough. 

The latest study shows that both developed and developing economies appear to be battling with the problem. Mason said, ``I expected that developed nations would show less contamination than developing, but it was quite the opposite. I really think this is simply owing to the prominence of plastic pollution within the environment. As plastic is a ubiquitous contaminant we can't expect to be able to filter ourselves out of this problem.'' 

Source: https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/slow-poison-tap-water-in-80-of-your-city-has-plastic-toxins/articleshow/61094839.cms


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80% of India’s surface water may be polluted, report by international body says


NEW DELHI: Even as India is making headlines with its rising air pollution levels, the water in the country may not be any better. An alarming 80% of India's surface water is polluted, a latest assessment by WaterAid, an international organization working for water sanitation and hygiene, shows.

The report, based on latest data from the ministry of urban development (2013), census 2011 and Central Pollution Control Board, estimates that 75-80% of water pollution by volume is from domestic sewerage, while untreated sewerage flowing into water bodies including rivers have almost doubled in recent years.

This in turn is leading to increasing burden of vector borne diseases, cholera, dysentery, jaundice and diarrhea etc. Water pollution is found to be a major cause for poor nutritional standards and development in children also.

Between 1991 and 2008, the latest period for which data is available, flow of untreated sewerage has doubled from around 12,000 million litres per day to 24,000 million litres per day in Class I and II towns.

The database defines Class I towns as those with a population of more than 1 lakh, whereas towns with population ranging between 50,000 to 1 lakh are classified as Class II.

The report, titled 'Urban WASH: An Assessment on Faecal Sludge Management (FSM) Policies and Programmes at the National and State Level', is likely to be released next week.

According to the report, inadequate sanitation facilities, poor septage management and a near absence of sanitation and waste water policy framework are primary reasons responsible for the groundwater and surface water pollution in the country.



Experts say there are glaring gaps not just in treatment of sewerage water but also in case of water treatment itself, used in supply of drinking water as well as for kitchen use etc.

"Though there are standards, the enforcement is very low. Even the amount of water, which is treated, is also not treated completely or as per standards. And there is no civic agency accountable or punishable for that because we do not have stringent laws," says Puneet Srivastava, manager policy- Urban WASH & Climate Change at WaterAid India.

Findings of the report show nearly 17 million urban households, accounting for over 20% of total 79 million urban households, lack adequate sanitation.

"Among those with access to improved sanitation facilities, a vast majority relies on on-site sanitation systems, such as septic tanks and pit latrines. Today, these septic tanks and pit latrines have become a major contributor to groundwater and surface water pollution in many cities in the country," the report said.

However, the report acknowledges that India has of late started focusing on the problem of septage management, which is one of the most immediately implementable solutions to address urban waste water.

But there is an urgent need to focus on infrastructure as well as enforcement, says Srivastava.


"Most of the sewerage treatment plants are performing under their capacity as these utilities do not have enough money to run full capacity," says Srivastava pointing at dearth of human resource, improper management etc.


Estimates show there were 269 sewage treatment plants across the country, with 211 in Class I cities, 31 in Class II towns, and 27 in other smaller towns.


"At the policy level, sanitation was not prioritized until the early 1990s and became an important policy concern only around 2008. It was not until the inception of the National Urban Sanitation Policy (NUSP) in 2008, that urban sanitation was allotted focused attention at the national level," the report said. 

Source: https://timesofindia.indiatimes.com/home/environment/pollution/80-of-Indias-surface-water-may-be-polluted-report-by-international-body-says/articleshow/47848532.cms

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Drinking water from sewage becomes reality


Highlights

  1. An a Bengaluru-based scientist has invented the 'Boom Tube Resonator'
  2. It recovers water fit for drinking and gives high-value fertilizer as a byproduct
  3. It uses no chemicals or micro-organisms
BENGALURU: Recycling is so yesterday. With the drinking water crisis becoming more acute, the world is looking at recovering used water. An invention by a Bengaluru-based scientist has seen his campus recover 10,000 litres of water from sewage every day and use it for drinking too.

Dr Rajah Vijay Kumar's invention - the Boom Tube Resonator - recovers water fit for drinking and gives high-value fertilizer as a byproduct. It uses no chemicals or micro-organisms.


Kumar's team has received queries from Doha and Oman to recover 3 lakh litres per day, and from Malaysia to salvage 10 lakh litres. "Singapore is interested in a large-scale project," he told TOI.


Recovering water from sewage wasn't a possibility until recently. Facing one of the worst drinking water crises, India may need to consider this for a better future. The country's groundwater table is depleting and surface water undrinkable.


India consumes 693 billion cubic metres of water a year and it's pegged to increase to 942 billion cubic metres by 2025 and 1,422 billion cubic metres by 2050. Water is rarely considered for reuse; segregation of sewage into clean water is uncommon. India discharges 38,400 million cubic metres of sewage annually, enough for the country if recovered. "We have excess water today," Kumar said as he sipped the recovered water. "It meets the drinking water standard (ISI 505)," he added.


Water turns sewage when mixed with excreta, urine, soaps or detergents. Some of these dissolve, the rest remain suspended. Very fine particles in sewage remain in motion due to electrostatic charge (often negative), which causes them to repel each other. Once their charge is neutralized, the particles collide and combine together.High-intensity wave : The Boom Tube Resonator applies this principle. It uses high-intensity shortwave to neutralize the fine particles present in sewage.

https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/Drinking-water-from-sewage-becomes-reality/articleshow/53645052.cms

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Tuesday, 10 October 2017

India needs to create greater economic opportunities for all & Other related News

Date:10-10-17

India needs to create greater economic opportunities for all

Maitreesh Ghatak
Thomas Piketty’s 2014 book, Capital in the 21st Century, which documents the rise of sharp income inequality in the developed world since the 1970s, became an unlikely bestseller for an academic book dense with facts and figures. In a recent article with Lucas Chantel, Piketty has turned his gaze on India (‘Indian Income Inequality, 1922-2014: From British Raj to Billionaire Raj?’, goo.gl/gbPEde).Combining income-tax data with household surveys and national accounts, Piketty and Chantel track income inequality from 1922, when the income tax was introduced by the British colonial government, to 2014.
Leaving aside measurement issues, their key finding is that the share of the very rich in the national income, after falling steadily since the late 1930s to the late 1970s, started rising from the early 1980s and has steadily increased since then to reach a historical high in 2014, the latest year covered by their study. And, the share of the bottom half, as well as of those in the middle of the distribution, show the opposite pattern over the same time-period.Thus, the authors conclude that top income shares were lower relative to the middle class and the poor in the 1950s to the 1970s due to “strong market regulations and high fiscal progressivity”, but this trend went the opposite way with the adoption of “pro-business policies” during the Rajiv Gandhi era, and continued with economic liberalisation. The authors do note their unwillingness to step into the old debate about the effect of reforms on poverty and inequality. But the way they frame their findings lends itself to the interpretation that low growth and government controls are good as they keep inequality down.Well, they do. They also keep average income levels down and more people below the poverty level.

Kuznets Curve

It was Simon Kuznets, who won the Nobel Prize in Economics in 1971, who first pointed out that economic growth leads to an increase in inequality at first, and then a decrease — the phenomenon being subsequently termed the ‘Kuznets curve’. In the early stages of development, those who are richer are better poised to take advantage of the new opportunities while an excess of supply of unskilled labour keeps average wages down.Eventually, however, capital accumulation leads to an increase in demand for labour that pushes up wages. Also, the increasing role of human capital in production pushes up the returns from acquiring skills. All of this leads to an eventual decrease in inequality.
The part of Chantel and Piketty’s article that has received less attention, in fact, demonstrates this clearly: for the period when inequality was falling, the growth rate of average income was low, and the subsequent rise in inequality has been accompanied by high growth rates. However, the growth rates of the richest have been much higher than the growth rates of those in the middle, and certainly of those in the bottom half, and that explains the trend of inequality. It also demonstrates clearly the validity of the basic logic of Kuznets.

Bridge The Divide

It also highlights the importance of distinguishing between undesirable versus natural inequality. The former emerges because the rich are given more opportunities than the poor while the latter arises even when everyone is given good opportunities, due to differences in skill, effort, and enterprise.
Under the former, we have a class society where one’s background governs one’s opportunities while in the latter people have a reasonable chance of doing well independent of their origins. Cross-sectional inequality can arise in a system that creates more opportunities and, therefore, winners and losers. While the intergenerational persistence of inequality occurs due to unequal distribution of opportunities.The focus of modern progressive policies should, therefore, be to create greater equality of opportunity, and not to restrict opportunities to equalise outcomes. Growth is not the enemy. Anytime someone criticises the increase in inequality that followed economic reforms, one should remember that 45% of the population was below the poverty line in the early ’90s. That percentage has gone down by almost half since, which means more than 100 million have moved above the poverty line. But before one gets a chance to get complacent, consider this fact: if instead of the income level that defines the poverty line, we take twice that value, even with three decades of relatively high growth, nearly 80% of the population is still below this threshold, which is striking given how stringently the poverty line is defined.
So yes, India has a major inequality problem, in terms of the distribution of gains of growth, reflecting differential opportunities. To tackle this, it needs a much greater investment in health and education, and much more of a conscious effort to create greater economic opportunities to help children from poor families experience upward mobility.It also needs a much more conscious effort to bring the rich under the tax net. And, in particular, inheritance taxes, which go after the main source of inequality of opportunity —wealth.
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Date:10-10-17

संस्थाओं को सुदृढ़ करने का वक्त

डॉ. भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्रियों में इस बात को लेकर सहमति बन रही है कि आर्थिक विकास की असल कंुजी देश की संस्थाओं में निहित है। सस्ते श्रम से आर्थिक विकास हासिल होना जरूरी नहीं है। जापान में श्रम महंगा है, फिर भी आर्थिक विकास में वह देश आगे है। आवश्यक नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों जैसे कोयले अथवा तेल के जरिए भी विकास हासिल हो ही जाए। सिंगापुर में प्राकृतिक संसाधन शून्यप्राय हैं, फिर भी उस देश की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका से भी अधिक है। तकनीकों से भी आर्थिक विकास जरूरी नहीं है। चीन के पास तकनीकें न्यून थीं, परंतु उनका आयात करके वह कहीं आगे निकल गया है। भारतीय मूल के वैज्ञानिक विदेशों मे जाकर नामी संस्थाओं के प्रमुख बन जाते हैैं और नोबेल पुरस्कार भी हासिल कर लेते हैं, क्योंकि वहां संस्थाओं में जवाबदेही और स्वतंत्रता, दोनों हैं।शासकीय संस्थाओं में सबसे अधिक महत्वपूर्ण नेताओं की विश्वसनीयता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच के अनुसार उत्तरी यूरोप के नार्डिक देशों के आर्थिक विकास का प्रमुख कारण वहां के नेताओं और अधिकारियों की ईमानदारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज हमारे देश में शीर्ष स्तर पर विकास की यह प्रमुख शर्त पूरी हो रही है। विश्व आर्थिक मंच ने यह भी कहा है कि नेता और जनता के परस्पर सहयोग से आर्थिक विकास हासिल होता है, जैसे परिवार में बड़े और छोटे के बीच सामंजस्य हो तो परिवार आगे बढ़ता है।
देश की जनता को आज प्रधानमंत्री मोदी पर विश्वास है। हालांकि अर्थव्यवस्था में सुस्ती के कारण तमाम लोगों की जीविका प्रभावित हो रही है, परंतु उन्हें भरोसा है कि आने वाले वक्त में सब अच्छा हो जाएगा। जनता का अपने नेता में यह विश्वास सुखद है। इस क्रम में सरकार को जनता पर भी भरोसा करना चाहिए। किसी छोटे उद्यमी ने कहा कि हम टैक्स भी देते हैं और बेईमान भी कहलाते हैं, जबकि भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को ईमानदार माना जाता है। इंदिरा गांधी ने बैंकों एवं कोयला कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके और शीर्ष उद्यमियों को जेल भेजकर एक नकारात्मक माहौल बनाया था, जिससे अर्थव्यवस्था दबाव में आई थी। नकारात्मक माहौल में उद्यमी की ऊर्जा का प्रस्फुटन नहीं हो सकता। नोटबंदी का आधार यह था कि जनता नंबर दो की कमाई को तिजोरी मे रखे हुए है। जीएसटी में खरीद एवं बिक्री का विस्तृत ब्योरा रिटर्न में मांगने का उद्देश्य है कि चोर को पकड़ा जा सके। जीएसटी की नजर में हर व्यापारी संदिग्ध है। हर शहर में रात में चोर घूमते हैं, लेकिन यदि पुलिस रात में अस्पताल जाने वाले के साथ चोर जैसा व्यवहार करे तो जनता दुबक जाएगी। सरकार को चाहिए कि हर नागरिक को ईमानदार समझे। जिन चुनिंदा लोगों पर शक हो, केवल उन लोगों से खरीद-बिक्री का ब्योरा मांगा जाए। जिस प्रकार देश की जनता को नरेंद्र मोदी पर विश्वास है, उसी प्रकार यदि प्रधानमंत्री जनता और संस्थाओं पर विश्वास करेंगे तो हमारा देश तेजी से आगे बढ़ेगा।दूसरी प्रमुख संस्था न्याय तंत्र है। अपने देश में न्याय तंत्र बीमार हो चला है। निचले स्तर की अदालतों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। यद्यपि युवा जजों के आने से नई लहर आई है, लेकिन पेशकार और वकीलों की मिलीभगत से वादी परेशान रहता है। मैंने किसी किरायेदार के विरुद्ध मामला दाखिल किया था। दो वर्षों तक किरायेदार कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ। जब निर्णय का समय आया तो किरायेदार हाजिर हो गया, फिर से पूरी प्रक्रिया चालू हुई। इस प्रकार के तमाम पैंतरों पर विराम लगाने की जरूरत है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की भी हालत अच्छी नहीं है। किसी भी केस का निर्णय आने में 10 से 20 वर्ष लगना आम बात है। इस दिशा में सुधार के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए।
नॉर्वे के नॉर्वेजियन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अनुसार टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए न्याय तंत्र की स्वतंत्रता जरूरी है। सरकार के निर्णयों पर न्यायालय द्वारा की गई समीक्षा से सही निर्णय पर पहुंचा जा सकता है, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम के निर्णय में किया था। सरकार को चाहिए कि न्यायालय की समीक्षा को सकारात्मक दृष्टि से देखे। न्यायालय की स्वतंत्रता का सरकार सम्मान करेगी तो सही निर्णयों पर पहुंचेगी। इस मुद्दे पर सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। सरकार ने जजों की नियुक्ति के लिए एक कमेटी बनाने का कानून बनाया था। इस कमेटी में अधिक संख्या में सदस्यों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जानी थी। इन सदस्यों के माध्यम से सरकार मनचाहे व्यक्तियों को जज नियुक्त कर सकती थी। मैं न्यायतंत्र पर बाहरी नियंत्रण का पक्षधर हूं, क्योंकि न्यायाधीशों द्वारा अपने परिजनों-परिचितों को जज बनाया जाता है, परंतु यह बाहरी नियंत्रण सरकार का नहीं होना चाहिए। कमेटी में कानूनी तौर पर चुने गए पेशेवर लोगों जैसे बार काउंसिल ऑफ इंडिया एवं इंस्टीट्यूट आफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष को नियुक्त किया जा सकता है। इसी क्रम में सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को अपंग बनाने की व्यवस्था कर दी है। वर्तमान में ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। सरकार ने कानून में संशोधन करके अफसरों को ट्रिब्यूनल का प्रमुख बनाने का रास्ता खोल दिया है। मनचाहे अफसर को नियुक्त करके सरकार ट्रिब्यूनल द्वारा सरकार के निर्णयों की समीक्षा पर रोक लगाना चाहती है, जो दीर्घकाल में सरकार के लिए ही हानिप्रद होगा जैसा नॉर्वेजियन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने कहा भी है।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि सफल अर्थव्यवस्था के लिए स्वतंत्र केंद्रीय बैंक जरूरी है, जो कि अल्पकालीन राजनीति से ऊपर उठकर निर्णय ले सके। चुनाव के पहले सरकार का प्रयास रहता है कि मतदाताओं को लुभाने के लिए लोक-लुभावन योजनाओं पर भारी खर्च करे, जैसे 2009 में कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफ किए थे। इन खर्चों को पोषित करने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज लेना होता है। यहां केंद्रीय बैंक यानी हमारे भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि रिजर्व बैंक अधिक मात्रा में नोट छापकर मुद्रा की तरलता बनाए रखे तो सरकार के लिए कर्ज लेकर अनुपयुक्त खर्च करना आसान हो जाता है जो कि बाद में अर्थव्यवस्था को ले डूबता है, परंतु यदि रिजर्व बैंक स्वतंत्र है तो नोट नहीं छपेगा। सरकार कर्ज नहीं ले सकेगी। गलत दिशा में नहीं जाएगी। वर्तमान सरकार ने व्यवस्था बनाई है कि अब मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी द्वारा मुद्रा नीति निर्धारित की जाएगी। इसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक के अधिकारी होंगे और तीन सदस्य सरकार द्वारा नामित होंगे। अल्पकाल में यह सरकार के लिए आरामदेह हो सकता है, परंतु जैसा कि ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन द्वारा कहा गया, यह व्यवस्था देश के दीर्घकालीन विकास के लिए ठीक नहीं है। नरेंद्र मोदी पर देश को भरोसा है। इस भरोसे को फलीभूत करने के लिए सरकार को हर नागरिक और प्रत्येक स्वायत्त संस्था को मित्र की दृष्टि से देखना होगा, अन्यथा इंदिरा गांधी की तरह यह सरकार भी देश को दीर्घकालीन विकास की पटरी पर नहीं ला सकेगी।
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Date:09-10-17

Resources aplenty, no jobs

Redefining economic models to get them in sync with the technology-accelerated age is the need of the hour

Anil K. Antony
We are in the midst of the most transformative age in human history where technological leaps could make possible a world of limitless food, water, and energy. Although we have attained the ability to produce any resource at any speed or in any quantity, human capital requirement is on a steep decline owing to the advent of cutting-edge technologies such as artificial intelligence and robotics.While five high-technology firms find themselves among the list of the top seven most valuable companies in the world, with a cumulative market capitalisation of almost $3 trillion, it is distressing to note that that they employ just under 700,000 people among them. The inevitable widespread adoption of next generation technologies indicates a future of mass unemployment, and concentration of wealth in the hands of a few enterprises capable of providing minuscule job openings.
Today’s primary challenge is the optimal allocation of copiously produced resources among an increasing population with dwindling wage-earning opportunities. Taking cue from these trends, several progressive political outfits across Europe have started demanding legislation favouring reduced working hours with no cuts in pay, three-day weekends, and the introduction of a universal basic income.Even if new models built around the reduction, sharing, and diffusion of work and the provision of a supplementary income can sustain employment levels and living standards in wealthy nations with a steady, declining, or ageing population, with most of them plugged into the formal economy, it will be impractical in countries like India. The Indian scenario already looks grim with the Labour Bureau stating that India added just 1.35 lakh jobs in eight labour-intensive sectors in 2015, against a backdrop of almost 1.5 crore annually entering the job market. Conditions are ripe for the creation of a plenitude of frustrated people who would be easy prey to the sway of radical nationalists and populists.
Nevertheless, the informal economy employs more than 90% of our workforce. Efforts to structure the informal sector, by encouraging them to adopt modern-day tools and best practices, and by giving them adequate access to capital for expansion, would stimulate the economy and the job market.India has massive basic infrastructural capacity requirements. Focussed government planning and spending, along with the creation of an environment that would encourage private investments into these potentially large-scale projects, could create immediate openings for millions in sectors like construction, India’s second largest employer, providing jobs for over 44 million. If leveraged to create essential and permanent assets, employment-guaranteeing schemes like MGNREGA would also effectively absorb a large slice of job seekers. Redefining the existing economic planning, employment and resource-allocation models, to get them in sync with this technology-accelerated age, is the need of the hour.

At Bonn, stay the course

At Bonn, stay the course

Renegotiation of the Paris Agreement on climate change is not a viable option

Between November 6 and 17 this year, world leaders, delegates from various countries and others from business, along with media and other representatives of civil society will gather at Bonn for the 23rd Conference of Parties (COP-23) of the United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC). The meeting will primarily concentrate on various aspects associated with the implementation of the Paris Agreement (PA), which was negotiated at COP-21 and entered into force, or became legally binding, on November 4, 2016.
COP-23 will be presided by Frank Bainimarama, Prime Minister of Fiji. It is fitting that a Pacific island nation chairs this year’s COP as the very existence of low-lying islands is threatened by sea level rise due to climate change. The meetings in Bonn will cover a wide range of issues, including adjusting to living in a warmer world with the associated impacts, known as adaptation to climate change and reduction in greenhouse gases, referred to as mitigation. They will also include sessions on loss and damage, or the means of addressing economic and non-economic forfeitures and potential injury associated with climate change. Finally, the discussions will be about the implementation of targets that were decided by each country ahead of the Paris meeting, referred to as the nationally determined contributions (NDCs), and the finance, capacity building and technology transfer required by developing countries from rich nations

Source: http://www.thehindu.com/opinion/op-ed/at-bonn-stay-the-course/article19829931.ece

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Tuesday, 26 September 2017

Solving food challenges with more research -M.S. SWAMINATHAN

Solving Food Challenges with More Research

Linking agricultural and nutritional outcomes is crucial

The world’s population is booming. According to estimates, the global population is likely to exceed 9 billion by 2050, with 5 billion people in Asia alone. The capacity to produce enough quality food is falling behind human numbers. Food production in the region must keep pace, even as environment sustainability and economic development are ensured. The answer to these challenges lies in research for sustainable development. As the second goal of the UN’s Sustainable Development Goals says: “End hunger, achieve food security and improved nutrition, and promote sustainable agriculture.”
Investing in research
India’s fivefold increase in grain production over the past 50 years is largely the result of strong scientific research that has focussed on high-yielding crop varieties, better agronomic practices, and pro-farmer policies. However, India continues to face challenges such as food insecurity and malnutrition, particularly in rural areas.
Providing the world’s growing urban population with safe and healthy food requires both a rural and a peri-urban agricultural movement — a huge challenge, but also an opportunity for ingenuity. Integrating agricultural production, nutrition, and health is emerging as a key focal point throughout Asia, with policymakers shifting their attention to the role of biodiversity and the power of local farming systems to improve nutritional status.
There is considerable potential in targeting underused crops such as millets, pulses, and vegetables as a sustainable means of increasing agricultural production and improving nutrition and health in high-need areas. In one project, researchers tested the sustainable use of traditional crops, vegetables, and fruit trees, as well as greater livestock diversity, to increase income and improve food and nutrition security in rural India. This project demonstrated that in three Indian “agro-biodiversity hotspots”, home gardens could provide households with up to 135 kg of legumes, vegetables, tubers, leafy greens, and gourds per year — more than double the amount of vegetables they were buying in local markets. These crops add value to existing farming systems by providing an additional source of income and/or more nutritious food for the family. The Food Security Act of 2013 was welcome, as was the inclusion of millets in the Public Distribution System as millets are superior to common grains in many ways and are also climate-resilient. Bio-fortification is also important in overcoming hidden hunger caused by micronutrient deficiencies such as iron, iodine, zinc, vitamin A, and vitamin B12.
Empowering women
Studies show that women make up nearly half of agricultural labourers, yet they carry out approximately 70% of all farm work. Women are among the most disadvantaged because they are typically employed as marginal workers, occupying low-skilled jobs such as sowing and weeding. Our research shows that empowering women is one of the best ways to improve nutrition. Research needs to continue focussing on the needs of women farmers to ensure that they are the direct recipients of development impacts, such as access to markets and income, to improve theirs and their children’s access to adequate and diversified diets.
Most importantly, it is crucial to continue to identify issues and seek evidence-based solutions through research. Building on the momentum of recent efforts by the government to improve understanding of India’s nutritional situation, there is considerable potential in building partnerships to extend the reach of research for development and to improve the connections between agricultural and nutritional research with extension services and policy. Taking a multisectoral approach that links agricultural and nutritional outcomes will help India sustainably grow, feed its people, and maintain the agricultural sector over the coming decades.
India’s research community is poised to be a leader in meeting new food challenges by increasing food quantity and quality to improve food security and nutrition. The world needs to tap into India’s research excellence to experiment, innovate, share knowledge, and scale up effective solutions.
M.S. Swaminathan is the founder of the MS Swaminathan Research Foundation, and Jean Lebel is the President of Canada’s International Development Research Centre

 SOURCE: THE HINDU

http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-opinion/solving-food-challenges-with-more-research/article19754690.ece

Friday, 22 September 2017

Wildlife Sanctuaries in News


Wildlife Sanctuaries in News


Kuno wildlife sanctuary to be notified national park
BHOPAL: The Madhya Pradesh



Wildlife board clears 2 oil refinery projects near Amsang sanctuary
GUWAHATI: The standing committee of the National Board for Wildlife (NBWL) has given nod to two projects of Gauhati Refinery located within 10 km of the Amsang Wildlife Sanctuary.




'No water woes for wildlife at Dalma this summer'
JAMSHEDPUR: Dalma Wildlife Sanctuary (DWS) has taken steps to ensure that wild animals here do not face any problem in availing clean water this summer.


Armori tigress shifted to Chaprala wildlife sanctuary, to be released today
Interestingly, the entire team of Wildlife Institute of India (WII) including tiger expert Bilal Habib, who is working on radio collaring project for tigers in Tadoba and its landscape, were conspicuous by their absence.

Nagpur: Fifteen days after it was captured from Armori in Wadsa Division of Gadchiroli, the three-year-old problem tigress was shifted to 134 sqkm Chaprala Wildlife Sanctuary, 225 km from here, late on Monday evening.



Kodaikanal wildlife sanctuary's living centenarians
MADURAI: Once thick with indigenous vegetation, especially lush Shola forests and meadows, the flora of the Kodaikanal hills have changed since 1970s thanks to the industrial planting of eucalyptus, wattle and pine trees. While this endangered the native trees, some species predominantly three of them have stood the test of time.



Kela Maram (Chionanthus ramiflorus) is assessed to be about 300 years old, Thani Maram (Terminalia bellerica) about 200 years old, and Kona Maram (Celtis tetranda) is believed to be about 150 years old were documented recently by an avid conservationist in the Kodaikanal Wildlife Sanctuary.


The sanctuary , spread in Western Ghats, is known for luxuriant flora and interesting fauna. It is bestowed with a variety of forests such as dry deciduous, semi-evergreen, evergreen, grassland and Shola forests.

Shola forests found here act as the overhead tank of the region supplying water not only to residents in the hills but those living in the foothills. "We could call these century-old trees inside forests as living organic monuments. The conservation of the trees and the forests is very much essential", said Sun dararaju.  



Tansa wildlife sanctuary falls prey to quarrying, timber mafia & brick kilns

Tansa spans 320 sq.km. in Thane and consists of tropical moist deciduous forests. The sanctuary also encompasses Tansa Lake, a critical source of drinking water for Mumbai and Thane supplying 455 million litres to the city daily. Yet its catchment forests are devoid of biodiversity that sustains similar ecosystems across the Western Ghats landscape. With approximately 60 villages located inside, the sanctuary faces tremendous anthropogenic pressure.


The Tansa Sanctuary is home to the critically endangered Forest Owlet. The species was considered extinct for 113 years until its rediscovery in November 1997 in Toranmal Reserve Forest of Shahada in Nandurbar. It was first spotted in Tansa in 2014. A recent survey by the Indian Bird Conservation Network reveals that the sanctuary and surrounding areas support a minimum population of 42 such birds.




7 arrested for unauthorized entry to Wayanad Wildlife Sanctuary, teasing wildlife


KOZHIKODE: Forest officials arrested seven persons for unauthrorised entry to the Wayanad Wildlife Sanctuary and engaging in destruction of wildlife habitat and teasing wild animals.



ZSI and IUCN comes together for tiger conservation in Nandhaur Wildlife Sanctuary


DEHRADUN: Following their successful collaboration on a project aimed at conservation of lions at the Gir Forest National Park in Gujarat, the Zoological Society of London (ZSI) and International union for Conservation of Nature (IUCN) are coming together for the second time in another venture aimed at protection of tigers in the Nandhaur Wildlife Sanctuary (NWLS) in Kumaon



Unique twin Shivlinga found in Mhadei wildlife sanctuary

KERI: A group of heritage lovers trekking through the Mhadei wildlife sanctuary along the ancient trading route to Karnataka found a unique twin Shivlinga in Caranzol akin to one in Khadki area of Sattari.



"A twin Shivlinga signifies worship of Shiva and Shakti in indivisible form. The bigger in shape represents Lord Shiva while the smaller one his consort, Parvati," according to a noted indologist, Pramod Pathak.


''The trekkers were on their way to Krishnapur in Karnataka through the ancient trading route passing along river Mhadei in Kelghat towards Khanapur.

"Thick growth of shrubs and trees used to make it difficult for the traders to locate the route for the next season. As such, they used to build some religious shrines as landmarks for their ease. Traders mostly used the route to Halshi, an old capital after the completion of monsoon," a source said.


In Goa, Shiva is worshipped in the form of a linga -- a cylindrical mass resting in the middle of a rimmed, disc-shaped structure. It's a popular tradition here to worship a single shivlinga on the 'yonipitha'.


Damodar Kosambi, a well-known historian, mentions that great Buddhist monasteries were built especially along mountain passes on the main trade routes.




Two jumbos for Dalma sanctuary
Daltonganj: Decks have been cleared for transfer of two female elephants from Dalma sanctuary to National Park Betla here. One of the two elephants will replace the aged and sick female elephant Anarkali at the Betla national park

The park has two domesticated female elephants, Anarkali, whose health is deteriorating and Juhi. Anarkali had joined the park way back in 1981 when she was just 20 years old. The two elephants offer ride to tourists twice a day.




Umred wildlife sanctuary renamed
NAGPUR: In a populist move, the state government has renamed Umred-Karhandla Wildlife Sanctuary (UKWS) in Bhandara and Nagpur districts as Umred-Paoni-Karhandla Wildlife Sanctuary.



Tuesday, 12 September 2017

कचरे के पहाड़ तले दबे शहरों को अपनाने होंगे विकल्प

कचरे के पहाड़ तले दबे शहरों को अपनाने होंगे विकल्प

Date:12-09-17

सुनीता नारायण

पिछले पखवाड़े दिल्ली में कचरे का पहाड़ गिरने से दो लोगों की मौत हो गई। ‘लैंडफिल’ के नाम से संबोधित किया जाने वाला कचरे का यह ढेर 50 मीटर से भी अधिक ऊंचा है। यह दिल्ली के तीन लैंडफिल में से एक है। वैसे यह लैंडफिल काफी पहले ही अपनी क्षमता पूरी कर चुका था। हर किसी को यह मालूम था कि ऐसा हादसा कभी भी हो सकता है। और आखिरकार ऐसा हो ही गया। सवाल है कि कचरे के पहाड़ को लेकर शहर क्या करेगा? हादसा होने के अगले ही दिन नगर निगम के अधिकारी कचरे के इस ढेर को दूसरी जगह भेजने पर विचार करने लगे। इसके लिए एक जगह की तलाश भी कर ली गई। लेकिन रानी खेड़ा गांव के लोगों ने इसका तीखा विरोध किया। उनका कहना था कि उनकी लाशों से गुजरकर ही कचरे का यह ढेर वहां भेजा जा सकता है। वे लोग ऐसा क्यों नहीं करते? क्या हम लोगों में से कोई भी व्यक्ति यह चाहेगा कि हमारे इर्दगिर्द कचरे का पहाड़ खड़ा हो? लेकिन जब यह कचरा हमारा है तो इसे हमारे पिछवाड़े क्यों न रखा जाए?सच तो यह है कि ‘हमारे पिछवाड़े ऐसा नहीं होगा’ कचरा प्रबंधन में एक गेम चेंजर है। कचरा प्रबंधन का वैश्विक इतिहास इसकी तस्दीक भी करता है। वर्ष 1980 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप के समृद्ध शहरों के कचरे के पहाड़ों को जहाजों पर लादकर अफ्रीकी देशों में ले जाया गया था। वह मामला एक घोटाले की तरह सामने आया था। इसके बाद ही हानिकारक कचरे को दूसरे देश ले जाने और उसके निपटान पर रोक संबंधी बेसल समझौते पर दुनिया भर में सहमति बनी। इस मामले में वैश्विक अमीरों की वह सोच उजागर हुई थी कि कचरा उनके पिछवाड़े नहीं रखा जाएगा। इसी सोच ने उस कचरे को अफ्रीका के गरीब निवासियों के पिछवाड़े भेजा था। लेकिन ये गरीब जब विरोध करने लगे तो अमीरों को अपना कचरा वापस लेना पड़ा और ऐसे तरीके खोजने पड़े कि कचरा उनके घर के सामने न जमा हो। पश्चिमी देशों में कचरा प्रबंधन का विकास ही इसी तरह हुआ है। उनके पास अपने कचरे को पिछवाड़े में ही खपाने, उसके पुनर्चक्रण या दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था।
इसी वजह से भारत को भी खुश होना चाहिए अब लोग कचरे को अपने पिछवाड़े रखने के लिए तैयार नहीं हैं। लंबे समय से हमने अपने शहरों के पिछवाड़े का इस्तेमाल कचरा फेंकने के लिए किया है जबकि गरीब लोग वहां रहते हैं। लेकिन सामाजिक एवं राजनीतिक जागरूकता बढऩे और शिक्षा का स्तर बढऩे से अब ये  लोग भी खुलकर कहने लगे हैं कि ‘बस बहुत हो गया। अपना कचरा हमारे पिछवाड़े नहीं फेंक सकते हैं।’ लेकिन उनके विरोध को अधिक तवज्जो नहीं दी जा रही है। शहरी प्रशासन और न्यायपालिका इस तरह के प्रदर्शनों को अक्सर गलत बताते रहते हैं। वजह यह है कि कचरा निपटान को नगर निगम का अहम काम समझा जाता है। ऐसे में लैंडफिल बनाने या कंपोस्ट संयंत्र बनाने के विरोध से खड़ी होने वाली अड़चनों को गैरजरूरी या गैरकानूनी माना जाता है। दरअसल प्रदर्शनों का नतीजा भी अलग होता है और वह इस पर निर्भर करता है कि विरोध करने वाले कौन हैं, अमीर या गरीब? इससे गरीबों का अपने पिछवाड़े में कचरा जमा करने से इनकार करना अपेक्षाकृत धनवान लोगों के विरोध से अलग हो जाता है। मध्यवर्ग अमूमन इस समस्या को दूसरे के पिछवाड़े डालने की कोशिश करता है। लेकिन अब गरीबों ने भी चुप्पी साधने से मना कर दिया है लिहाजा कचरे के इन ढेरों का निपटारा मुश्किल हो गया है। ऐसे में इसे अलग तरीके से निपटाना पड़ेगा। गरीबों के इस प्रतिरोध में कचरा निपटान को लेकर क्रांतिकारी आगाज की क्षमता है जिसमें कचरे को कचरा न मानकर संसाधन समझा जाएगा। स्वच्छ भारत अभियान में जोर-शोर से लगे शहरों में ऐसा ही कुछ हो रहा है। इन शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन के नए तरीके अपनाए हैं क्योंकि उनके पास कोई चारा ही नहीं रह गया था।
तिरुवनंतपुरम शहर से सटे विलप्पाल्सला गांव ने जब कचरे को अपने यहां फेंकने का विरोध किया तो उसे उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिल पाई थी। लेकिन गांव के लोग अडिग रहे और प्रशासन को कचरा प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों के बारे में सोचना पड़ा। नगर निगम का कहना है कि कचरा डालने की तय जगह नहीं होने से वह कचरा इक_ïा भी नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में या तो लोगों को बदबूदार कचरे के साथ रहने की आदत डालनी होगी या फिर कचरे का अलग करने और पुनर्चक्रण का तरीका सीख लेना होगा। ऐसा हो भी रहा है। इसी तरह के प्रदर्शन की वजह से पड़ोस के अलपुझा शहर में भी इकलौते लैंडफिल को बंद करना पड़ा है।कचरे को लेकर बगावत की घटनाएं बढ़ रही हैं। पुणे में उरुली देवाची गांव के लोगों ने मना कर दिया है कि अब वे इस शहर का कचरा अपने यहां नहीं डालने देंगे। बेंगलूरु में कन्नाहल्ली और बिंगीपुरा कचरा निपटान केंद्रों के आसपास रहने वाले लोग इनका विरोध कर रहे हैं। वेल्लूर में तो सदुप्पेरी के गांव वालों ने तो हथियारों के साथ घेराबंदी कर रखी है। इस सूची में और भी कई नाम हैं।इसके बावजूद दिल्ली जैसे शहरों के प्रशासक अब भी कचरा डालने के लिए दूसरी जगह की तलाश में लगे हैं। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही विरोध के स्वरों को शांत कर दिया जाएगा या फिर अदालत ही कोई मनमाफिक आदेश पारित कर देगी। तब तक पुरानी जगह पर ही कचरा फेंका जाता रहेगा और यह उम्मीद की जाती रहेगी कि कचरे का वह पहाड़ दोबारा न खिसके। लेकिन यह लंबे समय तक चलने वाला नहीं है।अब हमें यह मानना होगा कि यह असंतोष न केवल विधिसम्मत है बल्कि जरूरी भी है। दिल्ली को अब कचरा फेंकने के लिए नई जगह तलाशने के बजाय इसे अपने ही घर के पिछवाड़े ठिकाने लगाने के तरीके सीखने चाहिए। इसके लिए कचरा निपटान की पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी।

Monday, 11 September 2017

(1) Chhattisgarh Mine (2) Karwan-E-Mohabbat (3) Questioning the consumption (4) Biodiversity (5) Smart City (6) Invitation: Wild Vegetables festivals

(1) A Successful Protest Against a Chhattisgarh Mine Highlights the Failure of India’s Coal Auctions

https://thewire.in/175055/chhattisgarh-mine-protest-coal-auctions/