Tuesday, 12 September 2017

कचरे के पहाड़ तले दबे शहरों को अपनाने होंगे विकल्प

कचरे के पहाड़ तले दबे शहरों को अपनाने होंगे विकल्प

Date:12-09-17

सुनीता नारायण

पिछले पखवाड़े दिल्ली में कचरे का पहाड़ गिरने से दो लोगों की मौत हो गई। ‘लैंडफिल’ के नाम से संबोधित किया जाने वाला कचरे का यह ढेर 50 मीटर से भी अधिक ऊंचा है। यह दिल्ली के तीन लैंडफिल में से एक है। वैसे यह लैंडफिल काफी पहले ही अपनी क्षमता पूरी कर चुका था। हर किसी को यह मालूम था कि ऐसा हादसा कभी भी हो सकता है। और आखिरकार ऐसा हो ही गया। सवाल है कि कचरे के पहाड़ को लेकर शहर क्या करेगा? हादसा होने के अगले ही दिन नगर निगम के अधिकारी कचरे के इस ढेर को दूसरी जगह भेजने पर विचार करने लगे। इसके लिए एक जगह की तलाश भी कर ली गई। लेकिन रानी खेड़ा गांव के लोगों ने इसका तीखा विरोध किया। उनका कहना था कि उनकी लाशों से गुजरकर ही कचरे का यह ढेर वहां भेजा जा सकता है। वे लोग ऐसा क्यों नहीं करते? क्या हम लोगों में से कोई भी व्यक्ति यह चाहेगा कि हमारे इर्दगिर्द कचरे का पहाड़ खड़ा हो? लेकिन जब यह कचरा हमारा है तो इसे हमारे पिछवाड़े क्यों न रखा जाए?सच तो यह है कि ‘हमारे पिछवाड़े ऐसा नहीं होगा’ कचरा प्रबंधन में एक गेम चेंजर है। कचरा प्रबंधन का वैश्विक इतिहास इसकी तस्दीक भी करता है। वर्ष 1980 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप के समृद्ध शहरों के कचरे के पहाड़ों को जहाजों पर लादकर अफ्रीकी देशों में ले जाया गया था। वह मामला एक घोटाले की तरह सामने आया था। इसके बाद ही हानिकारक कचरे को दूसरे देश ले जाने और उसके निपटान पर रोक संबंधी बेसल समझौते पर दुनिया भर में सहमति बनी। इस मामले में वैश्विक अमीरों की वह सोच उजागर हुई थी कि कचरा उनके पिछवाड़े नहीं रखा जाएगा। इसी सोच ने उस कचरे को अफ्रीका के गरीब निवासियों के पिछवाड़े भेजा था। लेकिन ये गरीब जब विरोध करने लगे तो अमीरों को अपना कचरा वापस लेना पड़ा और ऐसे तरीके खोजने पड़े कि कचरा उनके घर के सामने न जमा हो। पश्चिमी देशों में कचरा प्रबंधन का विकास ही इसी तरह हुआ है। उनके पास अपने कचरे को पिछवाड़े में ही खपाने, उसके पुनर्चक्रण या दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था।
इसी वजह से भारत को भी खुश होना चाहिए अब लोग कचरे को अपने पिछवाड़े रखने के लिए तैयार नहीं हैं। लंबे समय से हमने अपने शहरों के पिछवाड़े का इस्तेमाल कचरा फेंकने के लिए किया है जबकि गरीब लोग वहां रहते हैं। लेकिन सामाजिक एवं राजनीतिक जागरूकता बढऩे और शिक्षा का स्तर बढऩे से अब ये  लोग भी खुलकर कहने लगे हैं कि ‘बस बहुत हो गया। अपना कचरा हमारे पिछवाड़े नहीं फेंक सकते हैं।’ लेकिन उनके विरोध को अधिक तवज्जो नहीं दी जा रही है। शहरी प्रशासन और न्यायपालिका इस तरह के प्रदर्शनों को अक्सर गलत बताते रहते हैं। वजह यह है कि कचरा निपटान को नगर निगम का अहम काम समझा जाता है। ऐसे में लैंडफिल बनाने या कंपोस्ट संयंत्र बनाने के विरोध से खड़ी होने वाली अड़चनों को गैरजरूरी या गैरकानूनी माना जाता है। दरअसल प्रदर्शनों का नतीजा भी अलग होता है और वह इस पर निर्भर करता है कि विरोध करने वाले कौन हैं, अमीर या गरीब? इससे गरीबों का अपने पिछवाड़े में कचरा जमा करने से इनकार करना अपेक्षाकृत धनवान लोगों के विरोध से अलग हो जाता है। मध्यवर्ग अमूमन इस समस्या को दूसरे के पिछवाड़े डालने की कोशिश करता है। लेकिन अब गरीबों ने भी चुप्पी साधने से मना कर दिया है लिहाजा कचरे के इन ढेरों का निपटारा मुश्किल हो गया है। ऐसे में इसे अलग तरीके से निपटाना पड़ेगा। गरीबों के इस प्रतिरोध में कचरा निपटान को लेकर क्रांतिकारी आगाज की क्षमता है जिसमें कचरे को कचरा न मानकर संसाधन समझा जाएगा। स्वच्छ भारत अभियान में जोर-शोर से लगे शहरों में ऐसा ही कुछ हो रहा है। इन शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन के नए तरीके अपनाए हैं क्योंकि उनके पास कोई चारा ही नहीं रह गया था।
तिरुवनंतपुरम शहर से सटे विलप्पाल्सला गांव ने जब कचरे को अपने यहां फेंकने का विरोध किया तो उसे उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिल पाई थी। लेकिन गांव के लोग अडिग रहे और प्रशासन को कचरा प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों के बारे में सोचना पड़ा। नगर निगम का कहना है कि कचरा डालने की तय जगह नहीं होने से वह कचरा इक_ïा भी नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में या तो लोगों को बदबूदार कचरे के साथ रहने की आदत डालनी होगी या फिर कचरे का अलग करने और पुनर्चक्रण का तरीका सीख लेना होगा। ऐसा हो भी रहा है। इसी तरह के प्रदर्शन की वजह से पड़ोस के अलपुझा शहर में भी इकलौते लैंडफिल को बंद करना पड़ा है।कचरे को लेकर बगावत की घटनाएं बढ़ रही हैं। पुणे में उरुली देवाची गांव के लोगों ने मना कर दिया है कि अब वे इस शहर का कचरा अपने यहां नहीं डालने देंगे। बेंगलूरु में कन्नाहल्ली और बिंगीपुरा कचरा निपटान केंद्रों के आसपास रहने वाले लोग इनका विरोध कर रहे हैं। वेल्लूर में तो सदुप्पेरी के गांव वालों ने तो हथियारों के साथ घेराबंदी कर रखी है। इस सूची में और भी कई नाम हैं।इसके बावजूद दिल्ली जैसे शहरों के प्रशासक अब भी कचरा डालने के लिए दूसरी जगह की तलाश में लगे हैं। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही विरोध के स्वरों को शांत कर दिया जाएगा या फिर अदालत ही कोई मनमाफिक आदेश पारित कर देगी। तब तक पुरानी जगह पर ही कचरा फेंका जाता रहेगा और यह उम्मीद की जाती रहेगी कि कचरे का वह पहाड़ दोबारा न खिसके। लेकिन यह लंबे समय तक चलने वाला नहीं है।अब हमें यह मानना होगा कि यह असंतोष न केवल विधिसम्मत है बल्कि जरूरी भी है। दिल्ली को अब कचरा फेंकने के लिए नई जगह तलाशने के बजाय इसे अपने ही घर के पिछवाड़े ठिकाने लगाने के तरीके सीखने चाहिए। इसके लिए कचरा निपटान की पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी।

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